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Friday, 5 September 2014

आयुर्वेद और भोजन

आयुर्वेद अनुसार भोजन के तीन प्रकार


हर व्यक्ति का खान-पान उसके संस्कार और संस्कृति के अनुसार होता है। खान-पान में युगों से जो पदार्थ प्रयोग किए जाते रहे हैं, आज भी उन्हीं पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। यह अवश्य है कि इन विभिन्न खाद्य पदार्थों में कुछ ऐसे हैं जो बहुत फायदेमंद होते हैं, तो कुछ ऐसे जो बेहद नुकसानदायक होते हैं। इसी आधार पर प्राचीनकाल में वैद्यों ने आहार को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में बाँटा था-

सात्विक भोज
यह ताजा, रसयुक्त, हल्की चिकनाईयुक्त और पौष्टिक होना चाहिए। इसमें अन्ना, दूध, मक्खन, घी, मट्ठा, दही, हरी-पत्तेदार सब्जियाँ, फल-मेवा आदि शामिल हैं। सात्विक भोजन शीघ्र पचने वाला होता है। इन्हीं के साथ नींबू, नारंगी और मिश्री का शरबत, लस्सी जैसे तरल पदार्थ बहुत लाभप्रद हैं। इनसे चित्त एकाग्र तथा पित्त शांत रहता है। भोजन में ये पदार्थ शामिल होने पर विभिन्न रोग एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से काफी बचाव रहता है।

राजसी भोज
इसमें सभी प्रकार के पकवान, व्यंजन, मिठाइयाँ, अधिक मिर्च-मसालेदार वस्तुएँ, नाश्ते में शामिल आधुनिक सभी पदार्थ, शक्तिवर्धक दवाएँ, चाय, कॉफी, कोको, सोडा, पान, तंबाकू, मदिरा एवं व्यसन की सभी वस्तुएँ शामिल हैं। राजसी भोज्य पदार्थों के गलत या अधिक इस्तेमाल से कब, क्या तकलीफें हो जाएँ या कोई बीमारी हो जाए, कहा नहीं जा सकता। 

इनसे हालाँकि पूरी तरह बचना तो किसी के लिए भी संभव नहीं, किंतु इनका जितना कम से कम प्रयोग किया जाए, यह किसी भी उम्र और स्थिति के व्यक्ति के लिए लाभदायक रहेगा। वर्तमान में होनेवाली अनेक बीमारियों का कारण इसी तरह का खानपान है, इसलिए बीमार होने से पहले इनसे बचा जाए, वही बेहतर है। 
  इसमें सभी प्रकार के पकवान, व्यंजन, मिठाइयाँ, अधिक मिर्च-मसालेदार वस्तुएँ, नाश्ते में शामिल आधुनिक सभी पदार्थ, शक्तिवर्धक दवाएँ, चाय, कॉफी, कोको, सोडा, पान, तंबाकू, मदिरा एवं व्यसन की सभी वस्तुएँ शामिल हैं।      


तामसी भोजन
इसमें प्रमुख मांसाहार माना जाता है, लेकिन बासी एवं विषम आहार भी इसमें शामिल हैं। तामसी भोजन व्यक्ति को क्रोधी एवं आलसी बनाता है, साथ ही कई प्रकार से तन और मन दोनों के लिए प्रतिकूल होता है।

खान-पान की खास बाते

* जब जल्दी में हों, तनाव में हों, अशांत हों, क्रोध में हों तो ऐसी स्थिति में भोजन न किया जाए, यही बेहतर है। 

* आयुर्वेद के अनुसार जो मनुष्य खाना खाता है, शरीर के प्रति उसका कर्तव्य है कि वह व्यायाम अवश्य करें। 

* बुजुर्गों के लिए टहलना ही पाचन के लिए पर्याप्त व्यायाम है। 

* भोजन ऋतु, स्थान और समय के अनुसार ही करें। बार-बार न खाएँ। यदि समय अधिक निकल जाए तो भोजन न करना ज्यादा अच्छा है। 

* भोजन के साथ पानी न पीएँ। आधे घंटे पहले और एक घंटे बाद पीएँ। 

* भूख को टालना ठीक नहीं। यह शरीर के लिए नुकसानदायक है। 

* दिनभर में इतना काम अवश्य करें कि शाम को थकावट महसूस हो। इससे भूख लगेगी और नींद भी अच्छी आएगी।

Saturday, 30 August 2014

मधुमेह (Diabetes) एवं आयुर्वेद : कारण, लक्षण व उपचार



मधुमेह (डायबिटीज ) नामक रोग में व्यक्ति बार-बार अधिक मात्र में क्लेद युक्त गाढ़ी चिपचिपी मूत्र करता है ,
मधुमेह दो शब्दों को मिलाकर बना है मधु और मेह, मधु यानि मधुर ,मीठा और मेह यानि पेशाब ।
मेहन का अर्थ है मुत्रेंद्रिया जिसके द्वारा मूत्र निसरण (निकलता है ) किया जाता है ....पीड़ित व्यक्ति पुनः पुनः अधिक मात्र में पेशाब करता है ,अत्यधिक थकान और दुर्बलता का अनुभव करता है ।

रक्त में शर्करा की मात्र अत्यधिक बढ़ जाने से शारीर के अंगों पर इसके बहुत सारे दुष्प्रभाव होते हैं -
सामान्य व्यक्ति में आहार से उत्पन्न शर्करा का अग्नाशय में पाचन होता है जिसमे इंसुलिन नामक होर्मोने के सहयोग से चयापचय होता है , लेकिन मधुमेह में अग्नाशय में इंसुलिन के निर्माण के हेतु महत्त्वपूर्ण बीटा सेल नष्ट हो जाते हैं, जिससे इंसुलिन का निर्माण नहीं होता .... कई बार जेनेटिक अब्नोर्मलिटी के कारण इंसुलिन मोलेकुल का रिसेप्टर उसे एक्सेप्ट नहीं करता ....... जिसके कारण शर्करा का उपयोग शारीर में उर्जा उत्पन्न करने के लिए नहीं होता ....और अतिरिक्त शर्करा रक्त में ही रह जाती है जो की खतरनाक है ।

मधुमेह के रोगी का शारीर दुर्बल हो जाता है ,क्लेद की अधिकता से शारीर के धातु (शारीर के मूलभूत तत्त्व रस, रक्त, मांस, इत्यादि ) का गलन होने लगता है .रक्त में शर्करा की मात्रा अधिक होने के कारण यदि कोई संक्रमण होता है तो वह मुश्किल से ठीक हो पाता है । रक्त में बढ़ी शर्करा जीवाणुओं के बढ़त के लिए उत्तम माध्यम का काम करती है ।

मधुमेह के सामान्य कारण -1.अत्यधिक मात्रा में गरिष्ठ ,घी तेल चिकनाई युक्त आहार , देर में पचने युक्त आहार का सेवन करना ।
2.नए अन्न यानि के एक वर्ष से पहले उगाया हुआ अन्ना नवान्न होता है ,हमेशा एक वर्ष पुराने अनाज का सेवन करें ,क्योंकि नए अन्न में क्लेद की मात्र अधिक होती है जिस से मधुमेह होने की सम्भावना होती है ,मधुमेह के रोगी भी इसका परहेज करें ।
3.अधिक मात्र में गुड ,चावल श्रीखंड इत्यादि का सेवन करना ,आटे के व्यंजन जैसे मठरी बालुशाई इत्यादि ।
4. दिवा स्वप्न यानि की दिन में सोना , यह कफ वर्धक होता है , एक आसन पर अधिक समय तक बैठे रहना , पैदल नहीं चलना, लगातार ए. सी. में बैठे रहना और व्यायाम का अभाव से मधुमेह हो सकता है ।
5. मानसिक कारण जैसे चिंता भय उद्वेग और तनाव ग्रस्त जीवन एक प्रमुख कारण है ।
6. अनुवांशिक कारण भी महत्त्वपूर्ण है ।
7. अधिक मात्रा में शराब , पिज़्ज़ा , बर्गर , देर से पचने वाले आहार का लगातार सेवन ।
इन कारणों से मधुमेह रोग की उत्पत्ति होती है।

उपचार एवं आहार -
1. रोग से सम्बंधित लक्षण नजर आने पर अपने पास के आयुर्वेद के डॉक्टर को दिखाना चाहिए। आयुर्वेद में इस रोग का अच्छा उपचार मौजूद है।
2. इस रोग से बचने के लिए जिन कारणों से यह रोग होता है उनका त्याग करना चाहिए, रोग से पीड़ित व्यक्ति को अपने खून में मौजूद शुगर के लेवल की काम से काम सप्ताह में एक बार जाँच जरूर करनी चाहिए।
3. जामुन , करेला , आमला, गिलोय का सेवन करना चाहिए , पानी अधिक पीना चाहिए , सुबह के समय खुली हवा में टहलना चाहिए। त्रिफला और शिलाजीत का सेवन भी लाभदायक होता है।
4. गोंद, बेसन , सोंठ , हल्दी को मिलाकर लड्डू बना लें इनका सेवन दिन में दो बार करें लड्डू में मीठा न मिलाये , लड्डू को गूंथने के लिए ओलिव आयल या सोयाबीन के तेल का प्रयोग करें।
इन बातों का ध्यान रखकर आप इस रोग से बच सकते है।


लेखक:
डॉ. अभिषेक गोयल 
अशोकनगर, मध्यप्रदेश