Wednesday, 17 September 2014

ऊँ का उच्चारण स्वास्थ्य के लिए लाभदायक


'ऊँ' उच्चारण के लाभ 


प्रतिदिन हमें आधा घंटे तक ऊँ का उच्चारण करना चाहिए है। ऊँ दुनिया का सबसे पवित्र अक्षर माना गया है। जिसका कोई निश्चित अर्थ नहीं है। यह निराकार व असीम को प्रकट करने वाला अक्षर है। उसका शब्दों द्वारा कोई अर्थ नहीं बताया जा सकता है। यह हमारे सूक्ष्म शरीर को ठीक करता है, लयबद्ध करता है। ऊँकार की ध्वनि करने से शरीर के कम्पन सुधरते है। मन शरीर व भावों में संतुलन आता है। ऊँ की ध्वनि करने से उत्पन्न कम्पन हमारी भावनाओं को सुहाते है, दिल को अच्छे लगते है। मन के शोर को कम करते है। स्वयं के प्रति सजग करते है। इस तरह के कम्पन से अशान्ति कम होती है, शान्ति बढ़ती है। स्नायु तन्त्र शिथिल होता है। उत्तेजना कम होती है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ संतुलित होकर अपना स्त्राव सही करती है। शरीर में फैले विषैले पदार्थ बाहर निकलते है। हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
ऊँकार की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन हमारे शरीर के स्नायुतन्त्र को संतुलित करते है। इनमें उत्पन्न विकार का शमन करते है। इससे उत्पन्न ध्वनि शरीर को व्यवस्थित करती है। शरीर अपने निज स्वभाव को प्राप्त होता है। असंतुलन,विकृति व अराजकता का नाश होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अणु को शान्ति मिलती है। उन्हें ठीक होने में मदद मिलती है।
श्री श्री रविशंकर ने कहा है कि प्रतिदिन आधा घंटा तक ऊँ का उच्चारण करने से कैंसर तक ठीक हो जाता है। उनका एक अनुयायी रोज गुंजन कर अपना कैंसर ठीक कर चुका है। उादहरण स्वरूप वह बताते है कि एक जर्मन व्यक्ति जो कि ऊँ से अनभिज्ञ था। लेकिन उसने अपनी बीमारी का सामना करने प्रातः उठ कर ऊँ के समान ध्वनि आधे घंटे तक करता था। वह इससे ठीक हो गया।

Monday, 15 September 2014

आश्चर्यजनक किन्तु सत्य !!!

Amazing truth about the World's best cofee!!!!!

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दुनिया में कई तरह की कॉफी मिलती हैं। कॉफी के शौकीन लोगों की भी संख्या कम नहीं हैं। लेकिन यह खबर महंगी कॉफी पीने वालों का टेस्ट खराब कर सकती है। क्योंकि दुनिया की सबसे महंगी कॉफी हाथी के गोबर से बनाई जाती है।

जी हां, एक रिपोर्ट के मुताबिक कॉफी बनाने के लिए हाथी के गोबर का इस्तेमाल किया जाता है और इसकी कीमत 4,200 रूपए है। हाथी के गोबर से निकलने वाले बीजों से ब्लैक आइवरी कॉफी बनाई जाती है। इस कॉफी को बनाने का आइडिया कनाडा के बिजनेसमैन ब्लेंक डिंकिन का है।

डिंकीन ने इस बारे में बताया कि हाथी जब माइक्रोब्स और पत्ती खाते है तो सेलुलेस की वजह से उनके गोबर से निकले बीज मीठे हो जाते हैं। इस कॉफी का टेस्ट चाय और कॉफी के मिश्रण जैसा होता है। फिलहाल यह कॉफी कुछ फाइव स्टार होटल और रिसॉर्ट में उपलब्ध कराई गई 


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Thursday, 11 September 2014

पायें हवन से अच्छा स्वस्थ्य


शोध संस्थानों के ताजा शोध नतीजे बताते हैं कि हवन वातावरण को प्रदूषण मुक्त बनाने के साथ ही अच्छी सेहत के लिए जरूरी है।

हवन के धुएं से प्राण में संजीवनी शक्ति का संचार होता है।

हवन के माध्यम से बीमारियों से छुटकारा पाने का जिक्र ऋग्वेद में भी है।

हवन के लिए पवित्रता की जरूरत होती है ताकि सेहत के साथ उसकी आध्यात्मिक शुद्धता भी बनी रहे।

हवन करने से पूर्व स्वच्छता का ख्याल रखें।

हवन के लिए आम की लकड़ी, बेल, नीम, पलाश का पौधा, कलीगंज, देवदार की जड़, गूलर की छाल और पत्ती, पीपल की छाल और तना, बेर, आम की पत्ती और तना, चंदन की लकड़ी, तिल, जामुन की कोमल पत्ती, अश्वगंधा की जड़, तमाल यानि कपूर, लौंग, चावल, ब्राम्ही, मुलैठी की जड़, बहेड़ा का फल और हर्रे तथा घी, शकर जौ, तिल, गुगल, लोभान, इलायची एवं अन्य वनस्पतियों का बूरा उपयोगी होता है।

हवन के लिए गाय के गोबर से बनी छोटी-छोटी कटोरियां या उपले घी में डूबो कर डाले जाते हैं।

हवन से हर प्रकार के 94 प्रतिशत जीवाणुओं का नाश होता है, अत: घर की शुद्धि तथा सेहत के लिए प्रत्येक घर में हवन करना चाहिए।

हवन के साथ कोई मंत्र का जाप करने से सकारात्मक ध्वनि तरंगित होती है, शरीर में ऊर्जा का संचार होता है, अत: कोई भी मंत्र सुविधानुसार बोला जा सकता है।
गायत्री मंत्र एक अच्छा विकल्प है.



Wednesday, 10 September 2014

अस्थमा (दमा) और आयुर्वेद



आयुर्वेद से काबू करें अस्थमा













अस्थमा और एलर्जी पीड़ितों के लिए यह माह थोड़ा खतरनाक होता है। क्योंकि बारिश के बाद सितंबर में धूल उड़ती है। बारिश के कीटाणुओं को फैलने-पनपने का मौका मिल जाता है। यूं भी वातावरणीय कारकोंसे फैल रही एलर्जी के कारण अस्थमा के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके साथ बदलती जीवनशैली और प्रदूषण के कारण भी अस्थमा और एलर्जी के मरीज बढ़ रहे हैं। कुछ आयुर्वेदिक औषधियां और घरेलू नुस्खे इसमें काफी राहत देते हैं।




क्या होता है अस्थमा ?

श्वास नलियों में सूजन से चिपचिपा बलगम इकट्ठा होने, नलियों की पेशियों के सख्त हो जाने के कारण मरीज को सांस लेने में तकलीफ होती है। इसे ही अस्थमा कहते हैं। अस्थमा किसी भी उम्र में यहां तक कि नवजात शिशुओं में भी हो सकता है।




अस्थमा : यह हैं लक्षण
बार-बार होने वाली खांसी
सांस लेते समय सीटी की आवाज
छाती में जकड़न
दम फूलना
खांसी के साथ कफ न निकल पाना
बेचैनी होना




बचाव ही सर्वोत्तम उपाय
धूल, मिट्टी, धुआं, प्रदूषण होने पर मुंह और नाक पर कपड़ा ढ़कें। सिगरेट के धुएं से भी बचें।
ताजा पेन्ट, कीटनाशक, स्प्रे, अगरबत्ती, मच्छर भगाने की कॉइल का धुआं, खुशबूदार इत्र आदि से यथासंभव बचें।
रंगयुक्त व फ्लेवर, एसेंस, प्रिजर्वेटिव मिले हुए खाद्य पदार्थों, कोल्ड ड्रिंक्स आदि से बचें।




दमा में कारगर जड़ी-बूटियां



वासा- यह सिकुड़ी हुई श्वसन नलियों को चौंड़ा करने का काम करती है।
कंटकारी- यह गले और फेंफड़ों में जमे हुए चिपचिपे पदार्थों को साफ करने का काम करती है।
पुष्करमूल- एंटीहिस्टामिन की तरह काम करने के साथ एंटीबैक्टीरियल गुण से भरपूर औषधि।
यष्टिमधु- यह भी गले को साफ करने का काम करती है।




प्रचलित आयुर्वेदिक औषधियां

कंटकारी अवलेह

वासावलेह

सितोपलादि चूर्ण

कनकासव


अगत्स्यहरीतिकी अवलेह


हरिद्राखंड






नोट: आयुर्वेदिक औषधियां कुशल चिकित्सक के निर्देशन में ही लें. आयुर्वेद डॉक्टर से निःशुल्क परामर्श के लिए यहाँ क्लिक करें.

Friday, 5 September 2014

गिलोय के गुण व आयुर्वेदिक प्रयोग

गिलोय (अमृता)



गिलोय का वैज्ञानिक नाम है–तिनोस्पोरा कार्डीफोलिया Tinospora cordiofolia। इसे अंग्रेजी में गुलंच कहते हैं। कन्नड़ में अमरदवल्ली , गुजराती में गालो , मराठी में गुलबेल , तेलगू में गोधुची ,तिप्प्तिगा , फारसी में गिलाई,तमिल में शिन्दिल्कोदी आदि नामों से जाना जाता है। गिलोय को अमृता, गड़ूची, मधुपर्जी आदि अनेक नामों से भी जाना जाता है।
कुछ तीखे कड़वे स्वाद वाली गिलोय देशभर में पायी जाती है। गिलोय हमारे यहां लगभग सभी जगह पायी जाती है। यह मैदानों, सड़कों के किनारे, जंगल, पार्क, बाग-बगीचों, पेड़ों-झाड़ियों और दीवारों पर लिपटी हुई दिख जाती है।
अगर आपके घर के आस-पास नीम का पेड़ हो तो आप वहां गिलोय लगा सकते हैं । नीम पर चढी हुई गिलोय उसी का गुड अवशोषित कर लेती है ,इस कारण आयुर्वेद में नीम पर चढ़ी हुई गिलोय श्रेष्ठ मानी गई है हालाकि अन्य साफ सुथरी जगहों पर लगी हुई गिलोय भी उपयोग में ली जा सकती है
गिलोय को अमृता भी कहा जाता है .यह स्वयं भी नहीं मरती है और उसे भी मरने से बचाती है , जो इसका प्रयोग करे . कहा जाता है की देव दानवों के युद्ध में अमृत कलश की बूँदें जहाँ जहाँ पडी , वहां वहां गिलोय उग गई .
आयुर्वेद में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। आचार्य चरक ने गिलोय को वात दोष हरने वाली श्रेष्ठ औषधि माना है। किसी भी प्रकृति के लोग इसे ले सकते हैं क्योंकि यह त्रिदोष को हरने वाली है वैसे इसका त्रिदोष हरने वाली, रक्तशोधक, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली, ज्वर नाशक, खांसी मिटाने वाली प्राकृतिक औषधि के रूप में खूब उपयोग किया जाता है।
इसकी तासीर गर्म होती है। इसमें प्रचुर मात्रा में एन्टी आक्सीडेन्ट होते हैं।
यह शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है। रोगों से लड़ने, उन्हें मिटाने और रोगी में शक्ति के संचरण में यह अपनी विशिष्ट भूमिका निभाती है। सचमुच यह प्राकृतिक ‘कुनैन’ है।
गिलोय एक रसायन एवं शोधक के रूप में जानी जाती है जो बुढापे को कभी आपके नजदीक नहीं आने देती है । यह शरीर का कायाकल्प कर देने की क्षमता रखती है। गिलोय के नित्य प्रयोग से शरीर में कान्ति रहती है और असमय ही झुर्रियां नहीं पड़ती .
किसी भी प्रकार के रोगाणुओं ,जीवाणुओं आदि से पैदा होने वाली बिमारियों, खून के प्रदूषित होने बहुत पुराने बुखार एवं यकृत की कमजोरी जैसी बिमारियों के लिए यह रामबाण की तरह काम करती है ।
इसे आवश्यकतानुसार अकेले या अन्य औषधियों के साथ दिया जाता है।
इसकी डंडी ( तना ) का ही प्रयोग करते हैं उसका लिसलिसा पदार्थ ही दवाई होता है .
डंडी को ऐसे भी चूस सकते है . चाहे तो डंडी कूटकर, उसमें पानी मिलाकर छान लें . हर प्रकार से गिलोय लाभ पहुंचाएगी .
इसे चूर्ण, छाल, रस और काढ़े के रूप मेंइस्तेमाल किया जाता है और इसके तने को कच्चा भी चबाया जा सकता है।
गिलोय का लिसलिसा पदार्थ सूखा हुआ भी मिलता है . इसे गिलोय सत कहते हैं . इसका आरिष्ट भी मिलता है जिसे अमृतारिष्ट कहते हैं . अगर ताज़ी गिलोय न मिले तो इन्हें भी ले सकते

बुखार में गिलोय के प्रयोग


  • पुराने -जीर्ण ज्वर या ६ दिन से भी अधिक समय से चले आ रहे न टूटने वाले ज्वरों में गिलोय 100 ग्राम अच्छी तरह कुचल कर मिट्टी के बर्तन में 300 -350 मिली पानी में मिलाकर रात भर ढक कर रखते हैं व प्रातः मसल कर छान लेते हैं । 100 ml की मात्रा दिन में तीन बार पीने से जीर्ण ज्वर नष्ट हो जाता है ।
  • ऐसे असाध्य ज्वरों में, जिसके कारण का पता सारे प्रयोग परीक्षणों के बाद भी नहीं चल पाता (पायरेक्सिया ऑफ अननोन ऑरीजन) समूल नष्ट करने का बीड़ा गिलोय ही उठाती है ।
  • २५० ग्राम गिलोय २ लीटर जल में पकाकर जब एक लीटर रह जाए तो इस जल को दिन में तीन बार 300 मिली की मात्रा में देने से असाध्य ज्वर दूर होता है व जीवनशक्ति बढ़ती है ।
  • गिलोय, धनिया, नीम की छाल, और लाल चंदन इन सब को समान मात्रामें मिलाकर काढ़ा बना लें। इस को सुबह शाम सेवन करने से सब प्रकार का ज्वरठीक होता है।
  • शरीर में गर्मी अधिक है तो इसे कूटकर रात को भिगो दें और सवेरे मसलकर शहद या मिश्री मिलाकर पी लें .
  • गिलोय रस में खाण्ड डालकर पीने से पित्त का बुखार ठीक होता है। औरगिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करने से पित्त का बढ़ना रुकता है।
  • गिलोय का रस को नीम के पत्ते एवं आंवला के साथ मिलाकर काढ़ा बना लें।प्रतिदिन 2 से 3 बार सेवन करे इससे हाथ पैरों और शरीर की जलन दूर हो जातीहै।
  • गिलोय, पीपल की जड़, नीम की छाल, सफेद चंदन, पीपल, बड़ी हरड़, लौंग, सौंफ, कुटकी और चिरायता को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्णके एक चम्मच को रोगी को तथा आधा चम्मच छोटे बच्चे को पानी के साथ सेवन करनेसे ज्वर में लाभ मिलता है।
  • गिलोय, सोंठ, धनियां, चिरायता और मिश्री को सम अनुपात में मिलाकर पीसकरचूर्ण बना कर रोजाना दिन में तीन बार एक चम्मच भर लेने से बुखार में आराममिलता है।
  • गिलोय, कटेरी, सोंठ और अरण्ड की जड़ को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर पीने से वात के ज्वर (बुखार) में लाभ पहुंचाता है।
  • गिलोय के रस में शहद मिलाकर चाटने से पुराना बुखार ठीक हो जाता है। औरगिलोय के काढ़े में शहद मिलाकर सुबह और शाम सेवन करें इससे बारम्बार होनेवाला बुखार ठीक होता है।
  • गिलोय के रस में पीपल का चूर्ण और शहद को मिलाकरलेने से जीर्ण-ज्वर तथा खांसी ठीक हो जाती है।
  • गिलोय, सोंठ, कटेरी, पोहकरमूल और चिरायता को बराबर मात्रा में लेकरकाढ़ा बनाकर सुबह और शाम सेवन करने से वात का ज्वर ठीक हो जाता है

प्लेटलेट के लिए प्रयोग 


  • अगर platelets बहुत कम हो गए हैं , तो चिंता की बात नहीं अलोवेरा का जूस लगभग ४० ml (या गूदा ५ चम्मच ) + ६” गिलोय तना + तीन पत्ते पपीते के + ११ पत्ते तुलसी के + शहद १० ml (यदि शुगर की समस्या न हो तो ) इन सब औषधियों को अच्छे से मिक्सी में पीस कर जूस को छान कर तीन बराबर मात्राओं में दिन में तीन बार पिलायें .......चमत्कारी प्रयोग है.

गिलोय के कुछ अन्य अनुप्रयोग :

बाँझ नर या नारी को गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर खिलाने से वे बाँझपन से मुक्ति पा जाते हैं। गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर नियमित खिलाने से बाँझपन से मुक्ति मिलती हैं। हालाँकि बांझपन में इसके प्रयोग व परिणाम एक शोध का विषय है. इसे रसायन के रूप में शुक्रहीनता दौर्बल्य में भी प्रयोग करते हैं व ऐसा कहा जाता है कि यह शुक्राणुओं के बनने की उनके सक्रिय होने की प्रक्रिया को बढ़ाती है । इस प्रकार यह औषधि एक समग्र कायाकल्प योग है-शोधक भी तथा शक्तिवर्धक भी ।

  • अगर पीलिया है तो इसकी डंडी के साथ ; पुनर्नवा (साठी; जिसका गाँवों में साग भी खाते हैं) की जड़ भी कूटकर काढ़ा बनायें और पीयें .
  • कैंसर की बीमारी में 6 से 8 इंच की इसकी डंडी लें इसमें wheat grass का जूस और 5-7 पत्ते तुलसी के और 4-5 पत्ते नीम के डालकर सबको कूटकर काढ़ा बना लें . इसका सेवन खाली पेट करने से aplastic anaemia भी ठीक होता है .
  • गैस, जोडों का दर्द ,शरीर का टूटना, असमय बुढापा वात असंतुलित होने कालक्षण हैं। गिलोय का एक चम्मच चूर्ण को घी के साथ लेने से वात संतुलित होताहै ।
  • गिलोय का चूर्ण शहद के साथ खाने से कफ और सोंठ के साथ आमवात से सम्बंधित बीमारीयां (गठिया) रोग ठीक होता है।
  • गिलोय और गेहूं के ज्वारे का रस तुलसी और नीम के 5 – 7 पत्ते पीस कर सेवन करने से कैंसर में भी लाभ होता है।
  • क्षय (टी .बी .) रोग में गिलोय सत्व, इलायची तथा वंशलोचन को शहद के साथ लेने से लाभ होता है।
  • गिलोय और पुनर्नवा का काढ़ा बना कर सेवन करने से कुछ दिनों में मिर्गी रोग में फायदा दिखाई देगा।
  • एक चम्मच गिलोय का चूर्ण खाण्ड या गुड के साथ खाने से पित्त की बिमारियों में सुधार आता है और कब्ज दूर होती है।
  • प्रतिदिन सुबह-शाम गिलोय का रस घी में मिलाकर या शहद गुड़ या मिश्री केसाथ गिलोय का रस मिलकर सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर होती है।
  • फटी त्वचा के लिए गिलोय का तेल दूध में मिलाकर गर्म करके ठंडा करें। इसतेल को फटी त्वचा पर लगाए वातरक्त दोष दूर होकर त्वचा कोमल और साफ होतीहै।
  • सुबह शाम गिलोय का दो तीन टेबल स्पून शर्बत पानी में मिलाकर पीने से पसीने से आ रही बदबू का आना बंद हो जाता है।
  • गिलोय के काढ़े को ब्राह्मी के साथ सेवन से दिल मजबूत होता है, उन्माद या पागलपन दूर हो जाता है, गिलोय याददाश्त को भी बढाती है।
  • मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयो पर गिलोय के फलों को पीसकर लगाये मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयां दूर हो जाती है।
  • गिलोय और काली मिर्च का चूर्ण सम मात्रा में मिलाकर गुनगुने पानी सेसेवन करने से हृदयशूल में लाभ मिलता है। गिलोय के रस का सेवन करने से दिलकी कमजोरी दूर होती है और दिल के रोग ठीक होते हैं।
  • गिलोय और त्रिफला चूर्ण को सुबह और शाम शहद के साथ चाटने से मोटापा कम होता है और गिलोय, हरड़, बहेड़ा,और आंवला मिला कर काढ़ा बनाइये और इसमें शिलाजीत मिलाकर और पकाइए इस का नियमित सेवन से मोटापा रुक जाता है।
  • गिलोय और नागरमोथा, हरड को सम मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना कर चूर्ण शहद के साथ दिन में 2 – 3 बार सेवन करने से मोटापा घटने लगता है।
  • लगभग 10 ग्राम गिलोय के रस में शहद और सेंधानमक (एक-एक ग्राम) मिलाकर, इसे खूब उबाले फिर इसे ठण्डा करके आंखो में लगाएं इससे नेत्र विकार ठीक हो जाते हैं।
  • गिलोय का रस आंवले के रस के साथ लेने से नेत्र रोगों में आराम मिलता है।
  • गिलोय के रस में त्रिफला को मिलाकर काढ़ा बना लें। इसमें पीपल का चूर्णऔर शहद मिलकर सुबह-शाम सेवन करने से आंखों के रोग दूर हो जाते हैं औरआँखों की ज्योति बढ़ जाती हैं।
  • गिलोय के पत्तों को हल्दी के साथ पीसकर खुजली वाले स्थान पर लगाइए औरसुबह-शाम गिलोय का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से रक्त विकार दूर होकर खुजलीसे छुटकारा मिलता है।
  • गिलोय के साथ अरण्डी के तेल का उपयोग करने से पेट की गैस ठीक होती है।
  • श्वेत प्रदर के लिए गिलोय तथा शतावरी का काढ़ा बनाकर पीने से लाभ होताहै।
  • गिलोय के रस में शहद मिलाकर सुबह-शाम चाटने से प्रमेह के रोग में लाभ मिलता है।
  • गिलोय के रस में मिश्री मिलाकर दिन में दो बार पीने से गर्मी के कारणसे आ रही उल्टी रूक जाती है। गिलोय के रस में शहद मिलाकर दिन में दो तीनबार सेवन करने से उल्टी बंद हो जाती है।
  • गिलोय के तने का काढ़ा बनाकर ठण्डा करके पीने से उल्टी बंद हो जाती है।
  • पित्त ज्वर के लिए गिलोय, धनियां, नीम की छाल, चंदन, कुटकी क्वाथ का सेवन लाभकारी है, यह कफ के लिए भी फायदेमंद है।
  • नजला, जुकाम खांसी, बुखार के लिए गिलोय के पत्तों का रस शहद मे मिलाकर दो तीन बार सेवन करने से लाभ होगा।
  • 1 लीटर उबलते हुये पानी मे एक कप गिलोय का रस और 2 चम्मच अनन्तमूल काचूर्ण मिलाकर ठंडा होने पर छान लें। इसका एक कप प्रतिदिन दिन में तीन बारसेवन करें इससे खून साफ होता हैं और कोढ़ ठीक होने लगता है।
  • गिलोय का काढ़ा बनाकर दिन में दो बार प्रसूता स्त्री को पिलाने से स्तनों में दूध की कमी होने की शिकायत दूर होती है और बच्चे को स्वस्थ दूधमिलता है।
  • एक टेबल स्पून गिलोय का काढ़ा प्रतिदिन पीने से घाव भी ठीक होते है।गिलोय के काढ़े में अरण्डी का तेल मिलाकर पीने से चरम रोगों में लाभमिलता है खून साफ होता है और गठिया रोग भी ठीक हो जाता है।
  • गिलोय का चूर्ण, दूध के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से गठिया ठीक हो जाता है।
  • गिलोय और सोंठ सामान मात्रा में लेकर इसका काढ़ा बनाकर पीने से पुराने गठिया रोगों में लाभ मिलता है। या गिलोय का रस तथा त्रिफला आधा कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद पीने से घुटने के दर्द में लाभ होता है।
  • गिलोय का रस शहद के साथ मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से पेट का दर्द ठीक होता है।
  • मट्ठे के साथ गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण सुबह शाम लेने से बवासीर में लाभहोता है।
  • गिलोय के रस को सफेद दाग पर दिन में 2-3 बार लगाइए एक-डेढ़ माह बादअसर दिखाई देने लगेगा ।
  • गिलोय का एक चम्मच चूर्ण या काली मिर्च अथवा त्रिफला का एक चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर चाटने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
  • गिलोय की बेल गले में लपेटने से भी पीलिया में लाभ होता है। गिलोय केकाढ़े में शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  • गिलोय के पत्तों को पीसकर एक गिलास मट्ठा में मिलाकर सुबह सुबह पीने से पीलिया ठीक हो जाता है।
  • गिलोय के पत्तों के रस को गुनगुनाकरके इस रस को कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।
  • गिलोय का रस पीने से या गिलोय का रस शहद में मिलाकर सेवन करने से प्रदररोग खत्म हो जाता है। या गिलोय और शतावरी को साथ साथ कूट लें फिर एक गिलासपानी में डालकर इसे पकाएं जब काढ़ा आधा रह जाये इसे सुबह-शाम पीयें प्रदररोग ठीक हो जाता है।

मात्रा : गिलोय को चूर्ण के रूप में 5-6 ग्राम, सत् के रूप में 2 ग्राम तक क्वाथ के रूप में 50 से 100 मि. ली.कीमात्रा लाभकारी व संतुलित होती है।
गिलोय ताज़ी न मिलने पर गिलोयघन वटी या गिलोय सत् भी प्रयोग में लाया जा सकता है



बवासीर आयुर्वेद चिकित्सा व घरेलू नुस्ख़े


आजकल आधुनिक परिवेश गलत खान-पान और अधिकाधिक मांसाहार प्रवृत्ति से सीधे ताल्लुक रखने वाले लोग पेट की समस्या से जूझ रहे हैं जिसके कारण (पाइल्स, भगंदर या नासूर (फिस्टुला) और गुद्चीर (फिशर) से ग्रसित हो रहे हैं !
कुछ रोगी शुरुआत में इन रोगों को शर्म के कारण छुपाते रहते हैं और यह रोग धीरे धीरे गंभीरता को धारण कर लेता है !
नीम हकीमों और झोला छाप डॉक्टरों के भ्रामक विज्ञापन जाल से यह और अधिक बढ जाता है !

बवासीर क्या है- ?

-बवासीर गुदाद्वार के निचले हिस्से में मौजूद रक्त शिराओं में आने वाली सूजन है। हालांकि यह गुदाद्वार के भीतर होता है, लेकिन कई बार आप इसे गुदाद्वार के बाहर भी एक उभरे हुए मस्सों के रूप में महसूस कर सकते हैं। इस स्थिति को 'प्रोलैप्स' बवासीर कहते हैं। अकसर तीन में से एक व्यक्ति को किसी न किसी उम्र में बवासीर अवश्य होता है।

-कैसे पता लगे कि मुझे बवासीर है-?

-बवासीर एक तकलीफ दायक स्थिति है, इसमें शुरुआत में गुदाद्वार के सिरे पर खुजली आती है और अगर बवासीर की तकलीफ बढ ज़ाए तो इस जगह पर दर्द भी होता है और कई बार खून भी आने लगता है। आप को गुदाद्वार के हिस्से में भारीपन सा महसूस होता है या फि शौच के समय तकलीफ या दर्द भी होता है। शौच के बाद कई बार आपको अंदर के कपडो पर खून के धब्बे भी नजर आते हैं। यदि आप का बवासीर मस्से के रूप में बाहर आ जाए तो शौच के बाद धोते समय आप इन मस्सों को अपने हाथों पर भी महसूस कर सकते हैं।

-यह क्यों होता है-?

-इसका सबसे मुख्य कारण है कब्ज की परेशानी, अकसर कब्ज से ग्रस्त व्यक्ति शौच के समय काफी जोर लगाते हैं। इससे गुदाद्वार की नसों पर दवाब पडता है। जिसके परिणामस्वरूप ये नसें सूजकर बडी हो जाती है और मसों का रूप ले लेती है। गर्भावस्था और प्रसूति के दौरान यह समस्या ज्यादा होती है जिसके कारण बवासीर होने का भ्रम भी हो जाता है।

-क्या शुरुआत में ही इसे रोकने का कोई उपाय है-?

-आप जितना ज्यादा हो सके अपने भोजन में रेशेदार पदार्थ ज्यादा शामिल करें। खाद्यान्न अधिक खाएं, फल व सब्जी का उपयोग ज्यादा करें। रेशेदार और तरल पदार्थ आप के मल को कम कर देते हैं। जिससे यह आंतों के जरिए सहजता से फिसलकर बाहर आ जाता है। यानि आप अपने भोजन में अतिरिक्त रेशेदार पदार्थ शामिल करना चाहें या अपने वजन पर नियंत्रण रखना चाहें तो अपने डॉक्टर से अपनी आहार तालिका संबंधी सलाह लें।
-कुछ लोग शल्य क्रिया करवा लेते हैं परन्तु यह रोग पेट की खराबी के कारण फिर से हो जाता है !
इसीलिए इन रोगों में आयुर्वेद अमृत तुल्य कार्य करता है इससे रोग जड से समाप्त हो जाता है !
-एक बार बवासीर की तकलीफ से छुटकारा पाने के बाद, इसे दोबारा होने से रोकने के लिए आपको कइ तरह की सावधानियां अपनानी चाहिए -
-जैसे:- ध्यान रखें, अपने भोजन में अधिक रेशेदार पदार्थ शामिल करें और हर दिन ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं। फास्ट-फूड से परहेज करें। नियमित समय पर भोजन की आदत डालें। एक बार में कम भोजन करें, थोडे-थोडे समय के अवसर पर कई बार खाएं, धीरे-धीरें खाएं, भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाएं। भोजन में ताजे फल, पत्ते वाली सब्जियां और सलाद अधिक खाएं। तनावमुक्त रहने की कोशिश करें। नियमित व्यायाम करें, योगा व ध्यान से खुद को तनावमुक्त बनााएं। मल त्याग करते समय ताकत न लगाएं। सही भोजन और ज्यादा पानी पीने से आपका मल बिना किसी तकलीफ के आसानी से अपने आप बाहर आ जाएगा।

ऐसा न करें

तीखे चटपटे और मसालेदार या तला हुआ भोजन न खाएं। धूम्रपान न करें। पान, तंबाकू, गुटखा या पान मसाला न खााएं। कडक़ चाय या काफी न पिएं। मद्यपान या कोल्ड ड्रिंक्स का सेवन न करें।
-कुछ कब्ज से छुटकारा पाने के उपाय -
-एरंड तैल 20ml प्रति सप्ताह
-पंचसकार या त्रिफला या इसबगोल चूर्ण सोते समय
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लेख़क: 
डॉ नवीन चौहान
कंसलटेंट आयुर्वेद फिजिशियन व बवासीर भगंदर विशेषज्ञ 
मोबाइल : ०९८१८०६९९८९

अंजीर से स्वास्थय लाभ


अंजीर शरीर के लिए रामबाण है।
अंजीर को सर्दियों में खाने का विशेष
महत्व है। यह कब्ज को दूर करता है। 
इसमें में आयरन की काफी मात्रा में होता है। अंजीर में कई रासायनिक तत्व पाए जाते हैं इसमें पानी 80 प्रतिशल, प्रोटीन 3.5 प्रतिशत, वसा 0.2 , रेशे 2.3 प्रतिशत क्षार 0.7 प्रतिशत, कैल्शियम 0.06 प्रतिशत फॉस्फोरस 0.03, आयरन1.2 मिग्रा मात्रा 
में होता है। अंजीर में सोडियम के अलावा पोटेशियम, तांबा , सल्फर और क्लोरिन पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ताजे अंजीर में विटामिन ए अत्याधिक पाया जाता है। जबकि विटामिन बी और सी सामान्य होता है। ताजे अंजीर की तुलना में सूखे अंजीर में शर्करा और क्षार तीन गुना अधिक पाया जाता है।

सूखे अंजीर में ओमेगा 3 और फिनॉल के साथ-साथ ओमेगा 6 फैटी एसिड्स भी होते हैं। जो दिल की बीमारियों से रोकथाम करते हैं। अंजीर में कैल्शियम भी पाया जाता है। इसीलिए ये हड्डियों को मजबूत बनाता है। अंजीर में पौटेशियम होने के कारण यह ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है।अंजीर को दूध में उबालकर सुबह-शाम ऊपर से दूध पीने 
से यौनशक्ति बढ़ती हैं। गर्भवती महिलाओं 
के लिए भी यह नुस्खा लाभकारी है। इससे गर्भावस्था में शरीर में लौह तत्व की कमी 
दूर होती है।

रोजाना 5 से 6 अंजीर को उसके टुकड़े 
करके 250 मि.ली. पानी में भिगो दें। 
सुबह उस पानी को उबालकर आधा कर दें और पी जाएं। पीने के बाद अंजीर चबाकर खाएं तो थोड़े ही दिनों में कब्जियत दूर होकर पाचनशक्ति मजबूत होगी। बच्चों के लिए 1 से 3 अंजीर पर्याप्त हैं।

अंजीर को अधिक मात्रा में सेवन करना उपयोगी होता है। अस्थमा की बीमारी में सुबह सूखे अंजीर का सेवन करना अच्छा माना जाता है। डायबिटीज के रोग में अन्य फलों की तुलना में अंजीर का सेवन विशेष लाभकारी होता है। सूखे अंजीर को उबाल कर बारीक पीस कर अगर गले की सुजन 
या गांठ पर बांधी जाए तो लाभ पहुंचता है।

अंजीर में पेक्टिन होता है इसीलिए ये डाइजेस्टिव सिस्टम के लिए काफी फायदेमंद होता है। जमे हुए कोलेस्ट्रॉल को बाहर निकालता है। शरीर में सोडियम की अधिक मात्रा और पोटेशियम का लेवल कम हो जाने पर हाइपरटेंशन हो जाता है। वहीं अंजीर में कम सोडियम और पोटेशियम की अधिक मात्रा होती है। जो हाइपरटेंशन की समस्या को दूर करता है।
3-4 पके हुए अंजीर को छीलकर चीरे लगा दें और उसमें मिश्री का चूर्ण भर दें और रात को खुले आकाश में ओस से तर होने के लिए कहीं रख दें। सुबह इसका सेवन करें। इस नुस्खे से शरीर की गर्मी दूर होती है और खून साफ होता है।
अंजीर को साफ करके छोटे-छोटे टुकड़े में काट लें, फिर शक्कर की चाशनी बनाकर अंजीर के टुकड़ों को मिलाकर पाक बना लें उसमें बादाम की गिरी, पिस्ता, सफेद मुसली, छोटी इलायची, केशर आदि मिलाकर रखें। एक हफ्ते बाद इसे15-20 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करें। अंजीर के इस पाक को नियमित खाने से यौन शक्ति बढ़ती है। इंद्रिय शिथिलता दूर होती है। जो लोग शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं और जिनमें पुरुषत्व की कमी ऐसे लोगों को रोजाना दो-चार अंजीर खाना चाहिए। इससे सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी।